Tripursundari Ved Gurukulam - पितृदोष

 

पितृदोष कैसे लगता है व निवारण

 

पितृ या पिता का भाव - जन्म कुंडली का नवम भाव अत्यन्त महात्वपूर्ण भाव होता है । यह भाव जहाँ पिता के सुख, आयु व समृद्धि का कारक है वहीं यह जातक के स्वयं के भाग्य, उन्नति, तथा धर्म, संबधी लगाव को बताता है ।
सूर्य पिता का कारक होता है, वहीं सूर्य जातक को मिलने वाली उन्नति एवं उसके प्रभाव क्षेत्र का कारक होता है। ऐसे में सूर्य के साथ यदि राहु जैसा पाप ग्रह आ जाए तो यह ग्रहण योग बन जाता है अर्थात सूर्य की दीप्ति पर राहु की छाया पड़ जाती है । ऐसे में जातक के पिता को मृत्यु तुल्य कष्ट होता है, जातक के भी भाग्योदय में बाधा आती है, उसे कार्यक्षेत्र में विविध संकटों का सामना करना पड़ता है। जब सूर्य और राहु का योग नवम भाव में होता है तो इसे पितृदोष कहा जाता है ।
सूर्य और राहु की युति जिस भाव में भी हो उस भाव के फलों को नष्ट ही करती है और जातक की उन्नति में सतत बाधा उत्पन्न करती है । विशेषकर यदि पहले, चैथे, पांचवे, दसवें, भाव में हो तो जातक का सारा जीवन संघर्षमय रहता है । सूर्य प्रगति, प्रसिध्दि का कारक है और राहु केतु की छाया प्रगति को रोक देती है । अतः यह युति किसी भी भाव में हो कठिनाइयाँं ही उत्पन्न करती है ।
निवारण - पितृदोष के बारे में आचार्यों का मत है कि पूर्व जन्म के पापों के कारण या पितरो के शाप के कारण यह दोष कुण्डली में प्रकट होता है । अतः पितृदोष का निवारण पितृ पक्ष में शास्त्रोक्त विधि से किया जाता है ।
अन्य उपाय -
(1) प्रत्येक अमावस्या को एक ब्राह्मण को भोजन कराने व दक्षिणा सहित वस्त्र भेंट करने से पितृदोष कम होता है ।
(2) प्रत्येक अमावस्या को उपले की धूनी लगाकर उसमें खीर का भोग लगाकर दक्षिण दिशा में पितरों का आवाहन करने व उनसे अपने कर्मों के लिये क्षमायाचना करने से भी लाभ मिलता है ।
(3) पिता का आदर करने, उनके चरण स्पर्श करने, पितातुल्य सभी मनुष्यों को आदर देने से सूर्य प्रबल होता है ।
(4) सूर्योदय के समय किसी आसन पर खड़े होकर सूर्य को निहारने, उससे शक्ति देने की प्रार्थना करने और गायत्री मंत्र का जप करने से भी सूर्य प्रबल होता है ।
(5) सूर्य को प्रबल करने के लिए माणिक्य भी पहना जाता है, लेकिन यह कुण्डली में सूर्य की स्थिति पर निर्भर करता है।
यह निश्चित है कि पितृदोष होने से जातक को श्रम अधिक करना पड़ता है, फल कम व देर से मिलता है तथा सन्तानोत्पत्ति में भी बाधा आती है। अतः इस हेतु मानसिक तैयरी करना व परिश्रम की आदत डालना श्रेयस्कर रहता है ।