Tripursundari Ved Gukulam - संस्कृत

 

संस्कृत/संस्कृति की ओर श्री‌त्रिपुरसुन्दरी वेद गुरुकुलम्

 

 

 
           संस्कृत भाषा, वेद, वेदाङ्ग, ज्योतिष, साहित्य, उपनिषद, एवं संस्कृति आदि के उत्‍थान के लिये स्‍थापित किया गया है। संस्कृत विषय की शिक्षा समाज की सभ्यता को बनाये रखने के लिये बहुत ही महत्वपूर्ण आविष्कार है ।


           संस्कृत भाषा (देवभाषा) एक ऐसा साधन है जो सोचने एवं भाव प्रकट करने में अत्यावश्यक है; इसी के सहारे समूचे विश्वभर में महान् कार्यों का संपादन होता रहा है । समस्त विश्व में जिस समाजिकता एवं संगठन शक्‍ति की बातें हम सुनते हैं या करते रहते हैं, वह कभी संभव न होता यदि संस्कृत भाषा न होती। और फिर भी इस महान् संस्कृत जो हमारी प्राचीन धरोहर है, ऋषि-मुनियों के तप का फल है, हजारों वर्षों के परिश्रम का प्रतिफल है, ऐसी विज्ञान की जननी को हम कितना सहज समझ लेते हैं।
        भाषाओं के इतिहास में यदि हम दृष्‍टि डालें तो देवभूमि भारतवर्ष में ही प्रथम संस्कृत-भाषा का प्रचलन चला था जो कि अनादिकाल से ही था, इसकी पुष्‍टि इस बात से हो जाती है कि सबसे पहले इस पृथ्वी में एक ही ग्रन्‍थ था जसिका नाम है 'ऋग्वेद'। इस अलौकिक ग्रन्‍थ के बाद ही श्रीकृष्‍णद्वैपायन व्यासजी ने यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद इन तीनों वेदों की रचना की थी, और इन सबके बाद ही पुराणों की रचना हुई।
            वेद के ही अनुसंधान से विज्ञान का उत्पादन हुआ है, जिसका परिणाम हमारे सबके सामने प्रस्तुत है। विज्ञान के जानकार इतना आगे बढ चुके हैं कि अपनी ही जननी वेद सभ्यता को भुला बैठा है। कुछ ही दिनों पहले की बात है कि किसी न्यूज चैनल में  तार्किक और एक ज्योतिषी की बहस चल रही थी। तार्किक का कथन था कि आप ज्योतिष के माध्यम से कोई चमत्कार दिखाइए?
            अब चमत्कार तो मात्र तन्‍त्र ही दिखा सकता है और विज्ञान से बढकर कोई तन्‍त्र होगा ऐसा समझ में नहीं आता क्योंकि दो या दो से अधिक वस्तुओं के सम्‍मिश्रण से बनी हुई वस्तु तन्‍त्र कहलाती है जैसे पोटास को कपास में लगाकर उसमें पानी का छिडकाव करने से आग लग जाती है यह एक वैज्ञानिक ही चमत्कार है लेकिन अकेले पोटास में पानी डालने से आग नहीं लग सकती। कहने का भाव यह है कि हमारी संस्कृति किसी चमत्कार को नहीं मानती हमारी संस्कृति तो संस्कारों को मानती है। एसे संस्कारों को जो बडों का आदर करना सिखाए, शास्‍त्रों का सम्मान करना सिखाए, दूसरे पन्‍थों का भी आदर करना सिखाए। ऐसी शिक्षाएँ तो मात्र संस्कृत विषय में ही प्राप्त होती हैं। वह देवभाषा ‘संस्कृत’ है जिसके बल पर भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता महान् बनी। 
             यदि हमारे और आपके सामने यह प्रश्न उपस्‍थित हो जाये कि भारत का सर्वश्रेष्ठ खज़ाना कौन-सा है और उसकी सबसे बडी विरासत कौन-सी है, तो बिना संकोच के कहना चाहिये कि ‘संस्कृत-भाषा, संस्कृत-साहित्य, क्योंकि उसके भीतर सब कुछ है। यही हमारी सर्वोत्तम विरासत है और जब तक ये जीवित रहेगी तब तक जन-मानस को प्रभावित करेगी और तब तक भारत गरिमा आसमान को छूती रहेगी।
सर विलियम जॉन्स, जिन्होंने सन् 1786 में पाश्चात्य जगत में यह ऐलान कर दिया था कि, संस्कृत वह भाषा है जो ग्रीक से अधिक पूर्ण है, लेटिन से अधिक समृद्ध है, और दोनों से हि अधिक सूक्ष्म-शुद्ध है । सर्व भाषाओं की जननी संस्कृत, सबसे प्राचीन, सबसे पूर्ण है।
               
               प्राचीन काल में  जन-जीवन का सर्वेक्षण करें तो संस्कृत भाषा शिरोमणि के रुप में उभर कर आती है । वैदिक काल से प्रकट होने वाली संस्कृत, उसके कई सदियों के पश्चात् भी आज तक नई दिखाई दे रही है। जब अन्य भाषाएँ केवल जन्म ले रही थी, संस्कृत-साहित्य अनेक रचनाकारों की माध्यम बन चुकी थी । संस्कृत वाङ्ग्मय वास्तव में विस्मयकारक है। अपौरुषेय वेदों ने तथा अन्य वेदकालीन रचनाओं एवं उत्तरकालीन संस्कृत रचनाओं के लिए एक सुदृढ आधार शिला रखी।




सूक्‍तियाँ



  1. संस्कृति वह शक्‍ति है जो हम सब को एकसूत्र में माला की भाँति पिरोती है।
  2. भारतीय संस्कृति की आधारशिला संस्कृत है।
  3. भाषा एक ऐसा माध्यम है जो भावनाओं तथा विचारों को समझने की शक्‍ति देती है।
  4. संस्कृत एक अति प्रचीन भाषा है। जिस प्रकार बिजली का एक बटन दबाने से अनेकों बल्ब जल जाते हैं, उसी तरह संस्कृत के एक स्वर वर्ण के उच्चारण से 18 प्रकार के आकारों का ज्ञान होता है।  
  5. संस्कृत भाषा के माध्यम से छात्रों को संस्कार प्राप्त होता है।
  6. प्रत्येक विद्यालय में नीति एवं सुभाषतानि के सुन्दर श्लोकों को पढाया जाये।
  7. सर्व प्रथम देह और मन को संस्कृतिमय करें, इसके पश्चात ही संस्कृत (देव) भाषा का प्रयोग करें तो निश्चित रूप से दैवी कृपा प्राप्त होगी। 
  8. संस्कृत प्रशिक्षण शिविर समय-समय पर आयोजित होता रहे तो संस्कृत जनसामान्य की भाषा के रूप में स्थान बना सकती है।
  9. सर्वश्रेष्ठ भाषा है संस्कृत (देवभाषा)।
  10. आइये सुसंस्कारित बनें ! सुसंस्कृत बनें ! साधुपुरुष बनें ! और उस भेद को मिटा दें जो प्रांतीय वर्गीय, जातीय, भाषा, संप्रदायिक और वित्त आदि के माध्यम से मानव-जीवन के बीच अर्गला बनकर खडा हो गया है।
  11. सभी भाषाओं में संस्कृत भाषा के अंश दिखाई देते हैं।
  12. संस्कृत भाषा में मात्र संस्कृत ही संस्कृत है और अन्य भाषा का प्रयोग नहीं है।
  13. संस्कृत भाषा सभी भाषाओं की जननी है क्योंकि सभी भाषाओं में संस्कृत के अंश अवश्य ही प्राप्त हो जाते हैं।
  14. एकता और विचारों की आधारशिला है संस्कृत।
  15. क्या करना चाहिये क्या नहीं करना चाहिये इन सभी बातो का ज्ञान होता है संस्कृत साहित्य से।
  16. सनातन धर्म एवं सभी हिन्दुओं के प्राण-आत्मा में बसने वाली है संस्कृत।
  17. सभी हिन्दुओं की विरासत है संस्कृत।
  18. आप सभी भी हमारे साथ होकर अपना श्रमदान इस नेक कार्य में तन, मन, धन से कर सकते है।
  19. करप्‍शन जैसी घृणित बीमारियाँ अपने आपको सुधारने से ही दूर हो सकती हैं।
  20. कुछ चीजें ऐसी होती हैं जोकि माँगने पर नहीं मिलती।

          उपर्युक्त सभी शिक्षाएँ किसी संस्कृत विद्यालय में ही संभव है इसी भावना से "आचार्य श्रीधीरेन्द्र जी ने श्रीत्रिपुरसुन्दरी शक्ति समिति/श्री‌त्रिपुर सुन्दरी वेद गुरुकुलम्  की  स्‍थापना की। और " संकल्प लिया कि श्री‌त्रिपुर सुन्दरी वेद गुरुकुलम् के माध्यम से अपनी संस्कृति एवं संस्कृत को जितना भी संभव हो उतना श्रमदान दें व संरक्षण दें।

2014 से अनवरत श्रीत्रिपुरसुन्दरी वेदगुरुकुलम् में ब्राह्मण बालकों को संस्कृत/संस्कृति की रक्षा के लिये प्रशिक्षित किया जा रहा है।

           एक व्यक्ति नेतृत्व तो कर सकता है किन्तु इतना बडा लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता। अतः समाज को चाहिए कि वो आगे आये और इस महा संकल्प को सिद्ध करने में गुरुकुल का सहयोग करें। ताकि हमारी पुरातन सभ्यता पुनः जीवित हो सके और हमें अमरता का वरदान दे सके।

 
निवेदकः श्रीत्रिपुरसुन्दरी वेदगुरुकुलम्